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#ज्ञात_है_कुछ_बातों_का_कोई_ओर_नहीं_होता

हर सवेरे के बाद शाम- सूरज ढलता हैं.... कुछ है जो भीतर ही भीतर, हिय को खलता है.... खलती है-शांत सी पथराई ऑंखें, खलती है-हृदय में दबी हुई सी गुमसुम बातें, ज्ञात है,कुछ बातों का कोई ओर नहीं होता अनगिनत बादलों से लदे, अथाह नीलगगन का कोई छोर नहीं होता इच्छाऐ हैं,जो- लहरों सी उद्वेलित होती हैं... कुछ क्षण उपरान्त, यथार्थ के सागर में - शांत लहरों सी सोती हैं.... ©प्रियंका सिंह

#बेवजह_का_समर्पण

आज फिर तुम्हारी गुमसुम आँखे बोल उठी हैं... आँसुओं की धार,रहस्य तेरे हिय का खोल बैठी हैं.. कब तक तकलीफों की कड़वी घुंट पियोगी.. कब तक तुम यूं ही एक टूक जियोगी... जरूरी तो नहीं हर परिस्थितियॉ सामान्य हो.. जरूरी नहीं कि तुम्हारा हर त्याग समाज को मान्य हो.. हृदयहीन ये समाजिक लोग तो अंधे हैं.. नारीयों को त्यागीमूर्त बनाना, इनके चिरकालीन गतिशील धंधे हैं... बेवजह का समर्पण छोड़ दो.... अपने भाग्य से जुड़े ,दुर्भाग्य की कड़ीयॉ तोड़ दो... उठो,लड़ो..ताकी परिवर्तन की आशाऐं जिन्दा हो.. जरूरी है कि... समाज भी अपनी दोहरी मानसिकता पर शर्मिंदा हो... ©प्रियंका सिंह

#मन्नतें

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#बेड़ीयॉ

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#रंग_सफेद

"सफेद"..... मेरे लिऐ- तुम सबसे अच्छे.... भड़किले,सजीले रंगो की भीड़ में- तुम सबसे सच्चे.... आप बेरंग बन,रंगो को खूब मान दिया, ताप,त्याग सा- अपने लिऐ...अपसगुणी का अपमान लिया.... मैंने माना... तुम में है,सहज-सरल प्रेम सी कांति.. तुम्हारे आलिंगन मात्र में मिले- मेरे अस्थिर मन को अद्भूत शांति...                                              प्रियंका सिंह

#_मैं_

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#मन_से_मन_की_बातें

#मन_से_मन_की_बातें किताबी बाते करना,यारों बंद करो.. पाण्डित्य प्रदर्शण के सुरों को, अब तुम मंद करों... आओ चलो.. कुछ नासमझों सी बातें कर लें... कुछ तुम मासूम मन की कह दो, कुछ हम मन सें मन की बातें सुन लें....                                    © प्रियंका सिंह