Posts

घनाक्षरी

#छंद - (#मरहरण_घनाक्षरी) समता की भावना से सजी इस दुनिया में जहाँ देखो वहाँ बस कपट की काली है । क्रोध, क्लेश और मृषा रूपी मैला उपवन जहाँ छल द्वेष स्यात् बने बैठा माली है । खो रही संवेदना से पल्लवित पादपों की, होती हतप्रभ कली, सूख रही डाली है । जिन गुणों हेतु मनु पशु से पृथक रहा आज उन्हें हार पशु-वृत्ति अपना ली है । ©प्रियंका सिंह #छवि - #गूगल

मुक्तक( राम आए हैं

सुवासित हो रहा कण- कण प्रभो श्री राम आये हैं।  धरा भी हो रही पावन प्रभो श्री राम आये हैं।  कि हर्षित हो रहा है जग मिटेगी सृष्टि की पीड़ा हुआ री ! धन्य जन - जीवन प्रभो श्री राम आये हैं।   © प्रियंका सिंह #रामनवमी_की_शुभकामनाएँ 🌸🙏 Pc - googl

भारत की पावन धृति पर रंगों का इतिहास रहा(गीत)

त्यौहारों के किसलय में कुसुमित मधुरिम उल्लास रहा भारत की पावन धरती पर रंगों का इतिहास रहा। यहाँ अवध के हर बालक ने मर्यादित रहना जाना  यहाँ प्रेम के गोकुल रँग से रँगा हुआ है बरसाना औ जीवन का रंग गुलाबी मतलब संधि - समास रहा भारत की पावन धरती पर रंगों........ केसरिया रँग त्याग लिए है, श्वेत, शांति की लय ध्याये रंग, हरा समृद्धि बताए और सुमति को हर्षाये रंग, कभी है रामराज्य-सा कभी निरा वनवास रहा भारत की पावन धरती पर रंगों........ आशाओं का रंग सुनहला, विश्वासों का धानी है भक्ति, रंग निर्मल गंगाजल, काव्य रंग रसखानी है नीला रंग जो नीलकंठ का लिए हुए कैलाश रहा भारत की पावन धरती पर रंगों........

जहाँ हृदय मे प्रेम (मुक्तक)

जहाँ हृदय में प्रेम अधर पर हो गुड़ -सी मीठी बोली  उत्सव नेह दया करुणा उस आँगन की है रंगोली  जिसकी लय व अलय में घुलती धैर्य सरीखी मृदु लाली, सतरंगी सपनों के सँग में प्राण वहाँ खेले होली

होली (घनाक्षरी)

घनाक्षरी रंग भरी पिचकारी अबीर गुलाल वारी मथुरा के अंगना में बही फगुनाई है। राधा के जो साँवरे हैं हुए आज बावरे हैं रंग अंग डारते जो देती वो दुहाई है। गोपियों के चित डोले कान्हा श्याम रंग घोले गोकुल की गलियों में मादकता छाई है। भीगा तन भीगा मन  भीगा वृंद उपवन भीगती हवा भी यहाँ आज होली आई है।

माँ अब बड़ी हो गई है।

माँ अब बड़ी हो गई है।  मेरे बाद  वो सीख गई है घर से निकलना , सड़क के किनारे  मेरा हाथ बिन थामे टहलना चौराहों पर गाड़ियों की आवा जाहि से अब बढ़ती नहीं उसकी धड़कने  अब सीख गई है सही समय पर  सही सलीके से सही बस स्टॉप पर उतरना ये अच्छा है कि हर बार घर पहुँचने की जल्दीबाज़ी या कहूँ की घबराहट में  अपने जोड़ों में पैठे दर्द की ख़ातिर  वो अब सीख गई है दौड़ते भागते  ठहरना वो कर लेती है अब धड़ल्ले से  सब्जियों में सारे मोल भाव सह लेती है अब अकेले वक़्त के तमाम धूप छाँव अब वो घबरा कर मुझसे लिपटती नहीं मैंने देखा है अब डर से वो सिमटती नहीं कई दफ़ा सब देख मैं स्तब्ध होती हूँ जिसे कभी अकेले रहना भाता न था बिन मेरे कोई निवाला गले से जाता न था अब वो अकेली बैठ "भात" पकाती है अब वो अकेली बैठ मन  बहलाती है माँ अब बड़ी हो गई है  वाकई  माँ अब बड़ी हो गई है  पर  कुछ बातें अब भी अच्छी है  गरमा गर्म फुलौरियों के लिए  वो अब भी बच्ची है। ऐसी कितनी ही बातें जाने क्या क्या याद दिलाती है  अब जब कभी माँ मुझे अपने घर बुलाती है। ©प्रियंका सिंह

कैसे होगी यह दीवाली.?

गीत बच्चे भूखे अकुलाते हैं घर में पसरी है बदहाली! मन विह्वल है सोच सोच कर कैसे होगी यह दीवाली.? कोई महलों की रंगत कर, कनक-कटोरी धोता है। चाँदी की चादर में लिपटा, ठाठ बाट से सोता ...