#दो_अंत_विदाई_प्रियवर_को

#दो_अंत_विदाई_प्रियवर_को
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देखा था बन्द आँखों से
उड़ता हुआ इक प्राण पखेरू
थी श्वेत सहज सरल सी आभा
था कुछ परिचित अनजाना सा
बढ़ता गया वह दूर गगन में
लगा हिय को पहचाना सा

भींच गई फिर सहसा मुट्ठी
थे जकड़ गए कई बोल
जब कानों में ध्वनि पड़ी
वह करुण रुदन -
द्रव भाव अमोल

तभी भान हुआ कि ...
टूट गया है घेरा अपना
बिखर गया एक भाग
चटक गई एक रीढ़ की हड्डी
फिर जली चिता की आग

उठ रही थी मुस्काती लपटें
मृदु स्नेह तपिश बरसाते हुए
संग प्रस्तावित - धैर्य की लपटे
भाव विरह भरमाते हुए

हो उठा प्रत्यक्ष वो मुखड़ा
पाट उर के गह्वर को
"अब नील गगन की ओर बसेरा
दो अंत विदाई प्रियवर को"

✍प्रियंका सिंह

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