तार तार होती वसुधा (गीत)

निसदिन मानव मानवता की ,भूल रहा परिभाषा है
तार तार होती नित वसुधा , होता रोज़ तमाशा है

आदि शक्ति देवी की प्रतिमा, जग में पूजी जाती है।
होकर अवमानित फिर कन्या , तिरस्कार क्यों पाती है ।
विकसित हो अब चिंतन धारा, व्याकुल मन की आशा है
तार तार होती नित वसुधा , होता रोज़  तमाशा है

यही बहन है बेटी माँ है, इनका मान करो प्यारे
छोड़ जगत की बातें बंदे, इसका ध्यान धरो सारे
समझें नारी की गरिमा सब, उर की यह अभिलाषा है
तार तार होती नित वसुधा , होता रोज़ तमाशा है

त्याग समर्पण खूब किया अब अधिकारों की बारी है
इक इक नारी ज्वाला है जो, सौ दानव पर भारी है
आया है क्षण पूरे कर लो, जो भी प्राण पिपासा है
तार तार होती नित वसुधा , होता रोज़  तमाशा है

प्रियंका सिंह

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