नियति
#नियति
घड़ी के रंगीन पटल पर
अंकित अंकों को
निहारा था मैंने ... एक टक
कानों की टेढ़ी मेढ़ी बनावटी
राहों से फिसलती हुई
"टिकटिकाहट" की आवाज़
पैठ रही थी.. मन में
और जकड़ रही थी
कलेजे को
ऐसे जैसे मानो सिकुड़ रहा है
"जीवन का पिंजरा"
समेट रही है साँसों को
एक अस्पष्ट दायरे में
वो पिद्दी-सी घड़ी की सूईयाँ
ऐसे जैसे चेत रहा हो कोई
अनभिज्ञ सा चिंतक
मुझे ... और तुम्हें भी
कि 'मुट्ठी भर समय ही शेष है'
घड़ी का ये छोटा सा रूप
रूपक ही तो है ....
उस विशाल से समय के चक्र का
जो प्रत्येक बढ़ते क्षणों के साथ
नाप रहा है एक भाग का
चौथाई सा हिस्सा, वही हिस्सा-
जो कटा जा रहा है
जीवन से.....
और अनायास ही सब कुछ
बढ़ा जा रहा है- अंत की ओर...
एक पल को जैसे -
सुलझ रही हो मानो
अनसुलझे रहस्यों की गुत्थी
और मुखर हो उठा कोई
सात्विक ज्ञान अवयस्क ,
अबोध से मन में -
" तथाकथित अंत की ओर
गतिमान है
एक सूक्ष्म सी टिकटिकाती हुई-
'प्रक्रिया '...यह कोई आश्चर्य नहीं , है ..तो केवल
पूर्व के पूर्व से संचालित
' नियति ' "
©®प्रियंका सिंह
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