कविता (छलावा)

#दिनांक 1/9/17

हाय ये जग निर्मोही कैसा निष्ठुर
हर क्षण नोच खसोट को आतुर

इंसानो की बस्ती में
बसे छल लोभ माया है
हर शख़्स यहाँ छलावा है
चेहरे पर चेहरा लगाया है
कहीं कोई संवेदना हीन है
कहीं कोई कपट में लीन है
कहीं किसी पर लाखों पहरे है
कहीं किसे के चोट बड़े गहरे है
आओ तुम भी गौर से देखो
यहाँ सब कुछ मात्र दिखावा है
इंसानो की काबिल बस्ती में
हर शक्स यहाँ छलावा है

#प्रियंका_सिंह

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