१४/७/१७ #लघुकथा #विषय- #मौसम आज फिर मौसम बहुत खराब हुआ पड़ा था..कहीं बाहर दूर दराज के आसमानों में नहीं बल्कि शीतल के मन मे .मन में आज फिर कई भवनाओं के बादल आपस में टकरा रहे थे जिससे जन्मी बिजली सी कड़क आवाज खाली पड़े घर में किचन के बर्तनों को जोर जोर से पटकने के रूप में आ रही थी ।जैसा कि हर बार होता आया साथ ही स्थियों के जायजे से समझ आ रहा था कि थोड़े ही देर में मन के बिगड़े इस मौसम में आँसुओ की बरसात होने ही वाली है ,हो भी क्यों ना आज फिर शीतल का मन आहत हुआ था - पर उसमे नया क्या था वो तो रोज ही होता है रोज़ ही मौसम(मन) खराब होते है रोज़ ही बरसात(आँसू) होती है।".....क्या मैं इंसान नहीं, क्या मुझमे कोई भावनाएं नहीं ....क्यों बार बार वो ये जताते है कि मैं बस घर के काम के लिए ही हूँ ..अरे लोग जब अपने घर मेहरी भी रखते है तो बकायदा इज्जत के साथ उसे पगार देते है पर मेरी तो यहाँ उससे भी बुरी हालत है ...क्यों जीना ऐसी जिंदगी जहां अपने लिए घंटे में से एक सेकंड भी नहीं ..इज्...
#दिनांक- 15/8/17 #स्वतंत्रता_दिवस_की_बधाई #ग़ज़ल 1222 1222 1222 1222 तिरंगे नाम पर कुर्बान है यूँ जान अपनी ये रहे ऊँचा वतन का ओहदा है शान अपनी ये सुनो तुम पाक हो या चीन हो है वक़्त संभल जा यही पैगाम देते है न भूलो मान अपनी ये अगर ख़ामोश हम समझो न कमजोरी हमारी यूँ अभी है जोर साहस से भरी पहचान अपनी ये इसी माटी में जन्मे है भगत आज़ाद जैसे जन हँसी के साथ दिए थे तब प्राण बलिदान अपनी ये रहा रुतबा हमारा शांति प्रिय देश के जैसा बढ़ाओ हाथ दोस्ती का यही ईमान अपनी ये #प्रियंका_सिंह
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