#दिन- शनिवार 16/09/2017 #आधार - छंद वाचिक राधा (मापनीयुक्त) #मापनी – 2122 2122 2122 2 अथवा - गालगागा गालगागा गालगागा गा #समांत - आते <> #पदांत – क्यों [ गीतिका ] धर्म के ही नाम पर तुम घर चलाते क्यों ? पाप से भर प...
ना जाने कौन सी स्थिति में हैं मेरी मनःस्थिति.... हर क्षण एक अजीब सी उकलाहट है, आप में ही अज्ञात सी बौकलाहट है.. जाने क्यों..? हर बार उस अंजान से मोड़ पर खुद को खड़ा पाती हूँ जहाँ से बस विषाद की गठरी का बोझ हर बार अपने कंधे पर ढोये लाती हूँ उस अज्ञात वन का वो छोर.. जहाँ से मुझे आगे बढ़ना है अवचेतन मन के रेतीले टीले की आखिरी ऊँचाई तक मुझे बेतहाशा चढ़ना हैं कुछ शेष बची हुई आशाएं है आशाओं के अवशेष रूप में कुछ इच्छाएं है जानती हूं इतना की - इन इच्छाओं की पूर्ति मार्ग पर , आगे असंख्य सी बाधाएं है.... कभी परिस्थितियों के विपरीत, भीतर ज़ोश- आक्रोश पाती हूँ कभी जिम्मेदारियों से दुर्बल, निर्जीव उम्मीदों के गर्त में - खुद को समाएं जाती हूँ समझ नहीं पाती आखिर क्या है... मेरे जीवन की अंतिम परिणति सच... ना जाने कौन सी स्थिति में हैं मेरी मन की मनःस्थिति....
#दिनांक- 18/8/17 #रदीफ़ - मान जाइए #काफ़िया - आत #ग़ज़ल फ़ाइलुन मफ़ाइलुन फ़ाइलुन मफ़ाइलुन 212 1212 212 1212 हो हसीन इक मुलाकात मान जाइए आज इश्क़ की है' शुरुआत मान जाइए बस वफ़ा भरी सभी वा...
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